Friday, 22 November 2013

चिराग तले अंधेरा



फिर चारों तरफ से नारेबाज़ी शुरू हो गई, फिर से मंच सज गए है, फेसबुक ट्वीटर पर ज्ञान गीत बजने लगे हैं। क्यों भाई..क्यों इतना हंगामा मचा रखा है? मीडिया के ऐसे आसाराम का सच आम लोगों के लिए चौंकाने वाला हो सकता है पर ये बिरादरी (मीडिया) खुद क्यों इतनी भौचक्की हैं? तहलका की महिला पत्रकार के साथ जो कुछ भी हुआ और फिर वो पूरी घटना जिस तरह से सार्वजनिक हुई शायद इसलिए हम यूं रोना पीटना मचा रहे हैं। पर क्या ये सच नहीं कि हर छोटे-बड़े मीडिया संस्थान में इस तरह के टी.टी. ()मौजूद हैं और अक्सर कोई न कोई महिला पत्रकार किसी न किसी तरह के शोषण का शिकार होती है।
खुद को सबसे ज़्यादा प्रगतिशील, निरपेक्ष, सत्यवादी और न्यायवादी मानने वाला समाज का ये वर्ग (मीडिया) आज  सवालों के घेरे में है वो भी अपने ही सहअस्तित्व की अस्मिता की सुरक्षा को लेकर। लेकिन क्या ये सवाल अचानक आ खड़े हुए हैं? नहीं ये तो पहले भी मौजूद थे पर इसे अनदेखा किया जाना भारी भूल साबित हुई।
एक ओर जब जंतर मंतर से लेकर इंडिया गेट तक निर्भया के लिए न्याय की गुहार लगाई जा रही थी और मीडिया उस जनसैलाब की आवाज़ बना था। वहीं दूसरी ओर किसी न्यूज़ रूम में एक अधेड़ उम्र का शख्स अपनी महिला सहकर्मी की नीलेंथ स्कर्ट पर अपनी बिन मांगी राय दे रहा होता है। कभी किसी अच्छी रिपोर्ट पर शाबाशी देने के बहाने किसी महिला रिपोर्टर की पीठ थपथपाना। किसी स्टोरी आइडिया को डिस्कस करने के बहाने घंटों अपने वाहियात चुटकुले सुनाना और न जाने क्या-क्या। ज़्यादातर मीडिया संस्थान में काम करने वाली महिलाओं को इस तरह की घटिया हरकतों से दो चार होना पड़ता हैं, कुछ इनका विरोध करके सामने वाले को चुप करा देती हैं और कुछ चुप रहकर घुटघुट कर काम करती हैं और इस तरह उन घटिया सोच के लोगों को बढ़ावा देती हैं।
एक और ग़लत धारणा है मीडिया में काम कर रहे कुछ पुरूषों की, अगर कोई महिला सहकर्मी सिगरेट और शराब पीती है और सभी से हंसकर बोल लेती है तो फिर कोई भी उसके कैरेक्टर का रचियता बनने लगता है। किसी खूबसूरत लड़की को अच्छा इंक्रीमेंट या प्रमोशन मिलना उसकी काबलियत नहीं बल्कि कुछ और ही समझा जाता है और फिर आफिस में उस लड़की की कहानियां और किस्सें हर कॉफी और चाय की टेबल पर नमक मिर्च लगा कर इस तरह बयां होते हैं जैसे हर कोई उसका सबसे करीबी हो। मीडिया की दुनिया की चकाचौंध में कई अंधेरे कोने यूं ही गुमनाम पड़े हैं जहां की ख़बरें कभी बाहर नहीं आतीं।

जब मैं पत्रिकारिता संस्थान से डिप्लोमा करके बाहर निकली तो मेरी एक दोस्त ने मुझे सलाह दी थी कि ऑफिस में किसी से ज़्यादा हंसकर बात मत करना, ज़्यादा सॉफ्ट मत बनना लोग ग़लत मतलब निकालेगें। बात बात में एक बार मैंने यह भी सुना कि जो लड़कियां न्यूज़रूम में चिल्ला चिल्लाकर बात करती हैं या फिर गाली गलौज करती हैं उनसे कोई कुछ ग़लत करने की कोशिश नहीं करता। अरे भाई खुद के साथ ग़लत होने से रोकने के लिए खुद को ग़लत बनाना ज़रूरी है मेरे हिसाब से बिल्कुल नहीं बल्कि ग़लत के खिलाफ़ बिना परिणाम की परवाह किए आवाज़ उठाई जानी चाहिए।
तहलका की महिला पत्रकार को मेरी बधाई जो उन्होंने चुप रह कर नौकरी छोड़ने की बजाय अपने साथ हुए ग़लत के लिए आवाज़ उठाई है। ये इतना आसान नहीं होता है, बहुत डर सताता है ख़ासकर अगर सामने वाला शख्स आपसे ज़्यादा ताकतवर हो। हिम्मत की बातें करना और हिम्मत दिखाना दोनों के बीच लंबा फासला तय करना होता है। महिला पत्रकार की इस एक आवाज़ से मीडिया में काम करने वाली हज़ारों दूसरी लड़कियों और महिलाओं को रास्ता दिखेगा जो किसी न किसी वजह से अपने साथ हुए ग़लत के खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठातीं। इसी के साथ हर नये आंदोलन के अग्रदूत रथ (मीडिया) को अपने पहियों में लगे दीमक को धूप दिखाने पर भी विचार करना होगा।


Wednesday, 30 October 2013

पहचान की परिभाषा


मेरी एक मित्र हैं, नारी विमर्श से जुड़े सभी मुद्दों पर उनकी राय बेजोड़ है। पर उनके एक सवाल ने मेरे मन में अनेक सवालों को जन्म दे दिया। उनका कहना था कि हर तरह के फॉर्म में सिर्फ पिता या पति का नाम क्यों पूछा जाता है? माता या पत्नी का क्यों नहीं? उन्हें पिता के नाम पर तो फिर भी कम आपत्ति थी पर पति को वो अपनी पहचान का हिस्सा मानने को बिल्कुल तैयार नहीं, (गौरतलब ये है कि वो शादीशुदा हैं)। उनका तर्क है कि अगर पत्नी के लिए अपने साथ पति की पहचान जोड़ना ज़रूरी है तो फिर पति की पहचान पत्नी के नाम से क्यों नहीं।
ये तो एक उदाहरण था। अब दूसरा सुनिए..मैं ट्रेन से दिल्ली से कानपुर आ रही थी। चेअर कार कंपार्टमेंट में मेरी आगे वाली सीट पर एक महिला यात्री आई...उम्र 30-35 के बीच रही होगी। उनके पास एक बड़ा सा बैग था, जिसे वो ऊपर रखने की कोशिश कर रही थीं, पर उनसे वो बैग उठाया नहीं जा रहा था..तभी उनकी बगल की सीट पर बैठे एक यात्री ने उनकी मदद करने की कोशिश की, पर उस महिला ने मदद लेने से साफ इंकार कर दिया, साथ ही उस आदमी को नसीहत भी दे दी कि औरतों को कमज़ोर मत समझा करों। आखिरकार उन्हें अपना बैग नीचे ही रखना पड़ा और पूरे सफर के दौरान गैलरी से आने जाने वाले यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ा।
मैं खुद महिलाओं के विकास और सुरक्षा की समर्थक हूं पर इस तरह पुरूषमुक्त समाज की नहीं। हमें ये क्यों नहीं समझ आता कि स्त्री और पुरुष दोनों ही इस सृष्टि के निर्माण और विकास के बराबर हिस्सेदार हैं, इनमें से कोई भी अकेले 100 फ़ीसदी का अधिकार हासिल नहीं कर सकता और अगर ऐसा करने की कोशिश हुई तो सिर्फ विनाश और विराम ही हाथ लगेगा।
सिर्फ एक फॉर्म में पत्नी या माता का नाम दर्ज हो जाने से सम्पूर्ण नारी जाति को उसकी पहचान नहीं मिल सकती, या फिर किसी पुरूष की मदद ले लेने से किसी स्त्री का कद कतई नहीं घट सकता। हमारे देश के कई इलाक़ों में न तो स्त्री को अपना नाम लिखना आता है न पुरुष को, दिन रात पेट की भूख मिटाने में जुटे ऐसे लोगों को भरपेट भोजन मिलना ही सम्मान पा लेने जैसा लगता है, ऐसे में किसी कागज पर नाम दर्ज करा लेने उनके लिए कोई अहमियत नहीं रखता। रहीं बात औरतों के साथ हो रहे अपराध और अन्याय की तो इसके लिए उन्हें सुरक्षा और उससे भी ज़्यादा आत्मरक्षा के लिए जागरुक बनाना ज़रूरी है। औरत होने के नाते हमें अपने साथ हो रहे हर तरह के अन्याय के लिए आवाज़ उठानी चाहिए और अपने हर अधिकार के लिए लड़ना चाहिए, पर इसके लिए हमें अपने घर और बाहर मौजूद उन पुरूषों को दोयम दर्जे पर बिल्कुल नहीं रखना चाहिए जो हर तरह से हर परिस्थिति में हमारे साथी बने हैं। इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि मान लीजिए आप के घर में आग लग जाए और सबकुछ तबाह हो जाए या फिर बाढ़ का पानी आपके बसे बसाए आशियाने को बहाकर ले जाए तो फिर आप क्या करेंगे?? क्या फिर आप जब तक ज़िंदा रहेंगे तब तक आग पर खाना नहीं बनाएंगे? या फिर पानी के बिना जी पाएंगे? ठीक वैसे ही औरतों के साथ हो रहे अन्याय के लिए सिर्फ दोषी पुरूषों से ही नफ़रत की जा सकती है इस धरती पर उनके अस्तित्व को नहीं नकारा जा सकता। महिलावादी होना बिल्कुल ग़लत नहीं पर अपनी पहचान के लिए अपने से जुड़े हर रिश्ते को कुर्बान कर देना मेरी समझ से परे है, मैं ग़लत भी हो सकती हूं पर मेरा मानना है कि अगर आप सारे बंधनों से परे अपनी बड़ी पहचान के साथ कितनी भी ऊंचाई पर हो आपके ऑफिस का प्यून, आप का ड्राइवर, आपका धोबी या फिर सब्जी वाला इनमें कोई भी पुरूष हो सकता है और आप अपनी रोजमर्रा की ज़िदंगी में इनकी मौजूदगी चाह कर भी नकार नहीं सकतीं।


Monday, 30 September 2013

हिन्दी के चंद दिन


हिन्दी पखवाड़ा बीत गया और साथ ही बीत गई हिन्दी के प्रति सम्मान दिखाने की बाध्यता। अगले बरस फिर से आएगा ये 15 दिनों का त्योहार फिर से सज जाएंगे सरकारी दफ़्तरों और इमारतों पर हिन्दी के सम्मान में कुछ बैनर और बोर्ड। कभी-कभी मुझे लगता है कि हिन्दी पखवाड़े और पितृपक्ष में बड़ी समानता है, दोनों ही पन्द्रह दिनों तक मनाये जाते हैं, हिन्दू धर्म के अनुसार पितृपक्ष में पूर्वजों को याद किया जाता है, उन्हें तृप्ति मिले इसलिए ब्राहमणों को भोज दिया जाता है, उसी तरह सिर्फ हिन्दी पखवाड़े के दौरान देश का पूरा सरकारी महकमा हिन्दीमय हो जाता है हर तरह सिर्फ हिन्दी के विकास की बातें होती हैं, हिन्दी में तरह तरह की प्रतियोगिताएं और न जाने क्या क्या। मेरा मानना है कि इस तरह हम हिन्दी को मजबूत नहीं बल्कि अपने से दूर कर रहे हैं। पूरे 15 दिनों की श्रद्भांजलि देकर, और श्रद्भांजलि किसे दी जाती है ये तो सभी जानते हैं। हिन्दी को गुज़रा हुआ समझ कर उसे याद करने की ज़रूरत नहीं है, हिन्दी उतनी ही सजीव है जितने हम और आप। जब हम अपने विकास के लिए रोज प्रयास करते हैं, रोज सीखते और बढ़ते हैं तो फिर हिन्दी के लिए सिर्फ 15 दिन क्यों।

कई सरकारी दफ़्तरों में एक तख्ती हमेशा टंगी मिलती है अगर आप हिन्दी का प्रयोग करेंगे तो हमें प्रसन्नता होगी यही तख्ती एक सरकारी दफ़्तर में मैंने अपने साक्षात्कार के दौरान देखी। यही नहीं प्रवेश द्वार से लेकर और साक्षात्कार कक्ष तक कई ऐसी ही हिन्दी के प्रति सम्मान दर्शाती पंक्तियां मुझे पढ़ने को मिलीं, बहुत खुशी भी हुई सोचा कि चलो अब अपनी ही भाषा में साक्षात्कार दूंगी। साक्षात्कार कक्ष में घुसी तो सबसे पहले मुझे अंग्रेजी में यह हिदायत दी गई कि आप हिन्दी का एक शब्द भी इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। बहुत बड़ा धक्का लगा मुझे। भारत में अंग्रेजी शासन तो अपनी आंखों से नहीं देखा था मैंने पर उस दिन पता चल गया कि क्या होता होगा हिन्दी बोलने वाले भारतीयों के साथ। बेमन से साक्षात्कार दिया और बाहर चली आयी मन किया कि वहां हिन्दी की प्रशंसा में लगी सारी तख्तियां उखाड़ कर फेंक दूं पर ऐसा करना मेरे बस में नहीं था फिर जैसी उम्मीद थी मेरा वहां चयन भी नहीं हुआ। सरकारी दफ़्तर ही क्यों हमारे कितने सांसद संसद की कार्यवाही के दौरान हिन्दी में प्रश्नोत्तर करते नज़र आते हैं? मुश्किल से चंद सांसद ही हिन्दी का उपयोग संसद में करते हैं। बाकी जिन्हें हिन्दी आती है वो भी नहीं करते और जिन्हें नहीं आती उनकी तो मजबूरी है।



यह तो बस एक छोटा सा किस्सा था ऐसे न जाने कितने दंश हिन्दी को रोज झेलने पड़ते हैं और ये तब तक जारी रहेगा जब तक हिन्दी रोज़गार की ज़रूरत नहीं बन जाती। बचपन में पढ़ा था आवश्यकता अविष्कार की जननी है अब लगता है आवश्यकता सिर्फ अविष्कार नहीं भाषाओं की भी जननी है। हिन्दी का विकास सिर्फ तख्तियां लगाने, हिन्दी दिवस और हिन्दी पखवाड़ा मनाने से संभव नहीं हैं। हिन्दी या किसी भी दूसरी भाषा का विकास सिर्फ उसकी उपयोगिता पर निर्भर है। हिन्दी फिल्में लोकप्रिय क्यों हैं, टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले ज़्यादातर विज्ञापन हिन्दी में क्यों होते हैं क्योंकि वो बाज़ार की ज़रूरत हैं और उनसे निर्माता और निर्देशक मुनाफ़ा कमाते हैं। हिन्दी में फ़िल्में और विज्ञापन बनाना किसी का हिन्दी प्रेम नहीं है बल्कि ये उनका रोज़गार है जिससे उनकी कमाई होती है। अगर मुनाफ़ा बंद हो जाए तो हिन्दी की जगह कोई और भाषा ले लेगी। इसलिए ज़रूरी है कि हिन्दी का रोज़गार की भाषा के रूप में विकास हो। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में भी पढ़ने और पढ़ाने की व्यवस्था हो। साथ ही ज्ञान और भाषा को एक ही तराजु में तौलनें की प्रक्रिया बंद हो क्योंकि किसी एक ख़ास भाषा का ज्ञान होना एक अलग बात है और ज्ञानी होना अलग।


                                                           

Friday, 13 September 2013

मैं हिन्दी हूं




मैं हिन्दी हूं, सिर्फ भाषा नही एक जीवन हूं, जीवनशैली हूं.. पूरब से पश्चिम,उत्तर से दक्षिण तक फैली हूं। हर जाति,धर्म,और भाषा के लोगों के साथ हो ली हूं, किसी की सखा किसी की सहेली हूं। मैं हवा हूं, बादल हूं, परिंदा हूं सिर्फ एक देश नहीं दुनिया के हर कोने में घूमी हूं। मैं हठी नहीं हूं पर आत्मसम्मान मुझे भी है प्यारा। मैं हर परिवेश, महौल और समय में घुलमिल जाती हूं, परिवर्तन सृष्टि का नियम है इसे मैं भी मानती हूं और बदलाव को खुले दिल से मैं भी स्वीकारती हूं।  
मैं हर मां की लोरी में उसके बेटे का दुलार हूं। मैं मंदिर में प्रार्थना, मस्जिद में नमाज़ और गुरूद्वारे की अरदास हूं। प्रेमी के ख़त में प्रेमिका के होठों की मुस्कान हूं। मैं हर चौराहे पर, हर फुटपाथ के कोने पर बैठे बेबस-लाचार की आवाज़ हूं। मैं कई रिश्तों की डोर हूं। कई ग्रंथों की आत्मा हूं। किसी का गर्व तो किसी की जीविका का साधन हूं। मैं सुन्दर हूं, सहज और सरल भी हूं, किसी भी रंग में मैं रंग जाती हूं और जो एक बार मेरे संग हो लेता है मुझमें ही मिल जाता है।
पर कभी कभी मैं भी दुखी और उदास हो जाती हूं। मेरे दुरूपयोग पर बस आंसू बहा कर रह जाती हूं। जब अपशब्दों के तीर किसी को घायल करते हैं तो मेरे भी सीने पर कई शूल मिलते हैं। जब लालच की राजनीति के लिए मुझे भरी सभा में नचाया जाता है तो मैं एक ही दिन में बार बार मरती हूं।

फिर भी मेरे अपनों ने मुझे जिंदा रखा है। मेरे सपनों ने मुझे पंख दिए हैं। मेरा विस्तार निरंतर जारी है, मैं दुनिया पर राज करूं न करूं पर करोंड़ों दिलों की मैं रानी हैं। 

Saturday, 7 September 2013

कब बदलेगी सोच?



मेरी पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने कन्या भ्रूण हत्या को लेकर एक बड़ा ही अजीब सा तथ्य रखा। उनका (हो सकता है और भी बहुत से लोगों का) मानना है कि लोग लड़कियां इसलिए नही चाहते क्योंकि लड़कियों की इज़्ज़त की सुरक्षा उनको पढ़ाने लिखाने और उनकी शादी करने की ज़िम्मेदारी से कहीं ज़्यादा बड़ी हो गई है। उनकी कही इस बात से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि अपने घर परिवार और आस-पास कई बार इस तरह की दलीलें सुन चुकीं हूं।
बहुत ही दुख की बात है कि आज हमारे समाज में महिला अपराध के बारे में जितनी खुल कर बातें हो रहीं हैं, महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून कड़े किए जा रहे है, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और समाज में उनकी हिस्सेदारी को ढोल पीट कर हर मंच पर रखा जा रहा है उतना ही उन्हें इस दुनिया में आने से रोका जा रहा है।
आश्चर्य होता है खुद को ऐसे समाज में देखकर जहां हमारे वजूद को बचाने के लिए हमें रोज एक लड़ाई लड़नी पड़ती है, कभी परिवार से, कभी समाज से।
एक ओर जहां कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए कई सरकारी और ग़ैर सरकारी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर देश में लिंगानुपात लगातार बिगड़ता जा रहा है। 1000 पुरुषों पर सिर्फ 914 महिलाएं। और सबसे ज़्यादा ये बात हैरान करती है कि गांवों की तुलना में शहरों के पॉश कहे जाने वाले इलाक़ों में अजन्मियों का क़त्ल सबसे ज़्यादा हो रहा है। उन्हीं इलाक़ों में रहने वाले कुछ ख़ास लोग बड़े बड़े सार्वजनिक मंच और न्यूज़ स्टूडियों में संवेदना के कुछ आंसू बहाकर और समस्या का समाधान शिक्षा प्रचार को थमा कर अपना काम पूरा कर देते हैं। मन को कई बार इस बात से आश्वासन दिया कि हो सकता है जैसे जैसे हमारा समाज शिक्षित होगा वैसे वैसे गर्भ में पल रही बच्चियों को भी उनके हिस्से की दुनिया नसीब होगीं, फिर अगले ही पल एक और सवाल ज़ेहन में पैदा हो गया, अगर कन्या भ्रूण हत्या का शिक्षा से कोई लेना देना होता तो पढ़े लिखे डॉक्टर अपने अस्पतालों में इस तरह का पाप न होनें देते और न करते। बात साफ है मुद्दा शिक्षा का नहीं सोच का हैं, और खुली और बड़ी सोच के लिए किसी डिग्री की ज़रूरत नहीं महौल की ज़रूरत होती है।
एक बड़ी सच्चाई यह भी है कि सिर्फ लड़की होने की वजह से कई बार घर से बाहर अपनी पहचान बनाने से पहले हमें अपनों को ही इम्तिहान देना पड़ता है, उन्हें भरोसा दिलाना पड़ता है कि हम घर, बच्चे, परिवार सब की इच्छाओं और फरमाइशों को पूरा करने के बाद ही कुछ अपने दिल की सुनेगें।
किसी ने राह चलते, भरी बस या भीड़ भरे बाज़ार में हमारे साथ बदसलूकी की और हमने उसे एक थप्पड़ जड़ दिया तो बहादुरी देने के बजाय कई बार उंगलियां हमारे चरित्र और पहनावे पर ही उठने लगती हैं। कहने में बहुत आसान लगता है कि बलात्कार से जिंदगी ख़त्म नहीं हो जाती, पीड़ित महिला को फिर से पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी ज़िंदगी जीनी चाहिए, कानून और समाज उसके साथ है और न जाने क्या क्या। पर क्या वाकई ऐसा है? और अगर हां तो फिर क्यों बलात्कार की शिकार एक आठ साल की बच्ची को उसके स्कूल से निकाल दिया जाता है? क्यों उनके मजदूर बाप को काम मिलना बंद हो जाता है? क्यों आस-पड़ोस के लोग अपने बच्चों को उस लड़की के साथ खेलने नहीं देते? क्यों हमारा समाज ऐसा बर्ताव उन लोगों के साथ नहीं करता जो इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं? क्यों उन लोगों के खिलाफ़ कड़े कदम नहीं उठाए जाते जो लड़कियों को पैदा होने से पहले ही मार देते हैं क्यों? क्यों ऐसे डॉक्टर्स को जेल में नहीं डाला जाता जो पैसों की लालच में जल्लाद बनें जा रहे हैं? क्यों?
इन सब सवालों पर हर बड़े मंच पर लगातार बहस जारी है....न जाने कब तक चलती रहेगी...कब ख़त्म होगा ये इंतज़ार और कब मिलेगा लड़कियों को पैदा होने और सम्मान से जीने का पूरा अधिकार ?

-शिखा द्विवेदी 



Friday, 9 August 2013

क्या मुझे भी ईदी मिलेगी?



ईद मुबारक, आज सभी गले मिलकर या बिना मिले ही मुबारकबाद बांट रहे हैं। शकील भाई के घर में पक रहे पकवानों की खुशबू पड़ोस में रहने वाले तिवारी जी के बेडरूम तक पहुंच रही है। बच्चों को हर बड़े से ईदी मिल रही है। मुझे बचपन से ईद की जो दो बातें सबसे ज़्यादा लुभाती हैं वो हैं मीठी-मीठी तरह तरह की सेवाइयां और ईदी। कई बार ईद पर अपनी दोस्त बुशरा के घर गई सेवइयां खाने..और उसके अब्बू अम्मी ने मुझे ईदी भी दी।
इस बार की ईद पर मैं बहुत से लोगों से ईदी लेना चाहती हूं लिस्ट बड़ी लंबी है..पर अगर कुछ लोगों से ही मिल जाए तो मेरी तिज़ोरी भर जाएगी।

सबसे पहले तो मैं अपने नेताओं से मौनव्रत रखने को कहना चाहती हूं जिससे उनके मुंह से निकलने वाले विषैले शब्दबाणों से जो प्रदूषण फैल रहा है वो कंट्रोल हो और जनता चैन की सांस ले सके।

दूसरी ईदी मुझे अपने प्रधानमंत्री जी से चाहिए वो ये है कि कृपया आप अपना मौनव्रत तोड़ दे, आपके उपवास से जिन्हें जो फायदा उठाना था उठा चुके अब अपनी विशेषज्ञता दिखाइये और रुपये को उठाइये।

तीसरी ईदी मुझे ऑटो रिक्शावालों से चाहिए जिन्होंने ऑटोरिक्शा खरीदा तो है चलाने के लिए पर अक्सर कहीं जाने को तैयार नहीं होते, अरे भाइयों अगर कहीं जाना नहीं तो घर जाकर आराम करों और सड़क पर क्यों लोगों का वक्त ज़ाया करते हो और बीपी बढ़ाते हो।

चौथी ईदी, ये तो सबसे ख़ास लोग हैं अक्सर हर लड़की से टकरा जाते हैं, सड़क, बस, ट्रेन हो या ऑफिस इन्हें हर लड़की अपनी ज़ागीर लगती है जब चाहा जहां चाहा अपनी दिमागी कंगाली का पिटारा खोल देते हैं, ऐसे सभी लोगों से विनम्र निवेदन हैं कि जब भी इस तरह की हरकत के लिए तन मन फड़फड़ाए तो फौरन खुद को जन्म देने वाली उस औरत को याद कर लेना और सोचना कि क्या उसके साथ ऐसा कर सकते हो।

पांचवी ईदी मुझे अपने इस प्रगतिशील समाज से चाहिए जो रोज नए मुकाम हासिल कर रहा है पर तरक्की की दौड़ में हमारा धैर्य, सहनशीलता, संतोष,प्रेम, और विश्वास ये सब रास्ते में कहीं गिरते गए और हम इन्हें रौंदते आगे बढ़ते जा रहे हैं..ज़रा रुकिए हर बार पीछे मुड़कर देखने से नुकसान नहीं होता..तो रूकिए पीछे मुड़िए और और अपने बिखरे पड़े जज़्बातों को समेटकर फिर से हरा करिए..शर्त लगाती हूं अगली ईद में दिल से सच्ची मुबारकबाद निकलेगी।

पता नहीं मुझे ये ईदी मिलेगी या नहीं? पर आप अपनी ईदी संभालकर रखिएगा क्योंकि इसमें अपनों की सच्ची दुआएं होतीं हैं बिना कोई मिलावट।


एक बार फिर ईद मुबारक!

Thursday, 18 July 2013

रिश्ते


रिश्ते

बंधन है या मुक्ति है.

जिज्ञासा है या तृप्ति है।

भावनाओं की नाज़ुक कश्ती है

या, जीवन की सिर्फ अभिव्यक्ति है।

कुछ सच्चा है, कुछ झूठा है,

कोई खुश है, तो कोई रूठा है।

कुछ बातें है, कुछ यादें हैं,

कुछ जाते, तो कुछ आते हैं।

जीवन के पहले दिन से ही ये साथ हमारा देते हैं,

बस रूप नया ले लेते हैं, और नाम नया रख लेते हैं।

कोशिश करने से भी इनसे दूर नहीं जा पाते हैं,

हर राह की हर एक मोड़ पर इन्हें पास खड़ा हुआ पाते हैं।

एक नाज़ुक सी डोर है ये, पर नहीं कहीं कमज़ोर है ये,

नज़र न आए हमको ये पर जकड़े हुए हैं मन को ये।