हिन्दी पखवाड़ा बीत गया और साथ ही बीत गई हिन्दी
के प्रति सम्मान दिखाने की बाध्यता। अगले बरस फिर से आएगा ये 15 दिनों का त्योहार
फिर से सज जाएंगे सरकारी दफ़्तरों और इमारतों पर हिन्दी के सम्मान में कुछ बैनर और
बोर्ड। कभी-कभी मुझे लगता है कि हिन्दी पखवाड़े और पितृपक्ष में बड़ी समानता है,
दोनों ही पन्द्रह दिनों तक मनाये जाते हैं, हिन्दू धर्म के अनुसार पितृपक्ष में पूर्वजों
को याद किया जाता है, उन्हें तृप्ति मिले इसलिए ब्राहमणों को भोज दिया जाता है,
उसी तरह सिर्फ हिन्दी पखवाड़े के दौरान देश का पूरा सरकारी महकमा हिन्दीमय हो जाता
है हर तरह सिर्फ हिन्दी के विकास की बातें होती हैं, हिन्दी में तरह तरह की
प्रतियोगिताएं और न जाने क्या क्या। मेरा मानना है कि इस तरह हम हिन्दी को मजबूत
नहीं बल्कि अपने से दूर कर रहे हैं। पूरे 15 दिनों की श्रद्भांजलि देकर, और
श्रद्भांजलि किसे दी जाती है ये तो सभी जानते हैं। हिन्दी को गुज़रा हुआ समझ कर
उसे याद करने की ज़रूरत नहीं है, हिन्दी उतनी ही सजीव है जितने हम और आप। जब हम
अपने विकास के लिए रोज प्रयास करते हैं, रोज सीखते और बढ़ते हैं तो फिर हिन्दी के
लिए सिर्फ 15 दिन क्यों।
कई सरकारी दफ़्तरों में एक तख्ती हमेशा टंगी
मिलती है “अगर आप हिन्दी का प्रयोग करेंगे तो हमें प्रसन्नता होगी”। यही तख्ती एक सरकारी दफ़्तर में मैंने अपने साक्षात्कार के दौरान
देखी। यही नहीं प्रवेश द्वार से लेकर और साक्षात्कार कक्ष तक कई ऐसी ही हिन्दी के
प्रति सम्मान दर्शाती पंक्तियां मुझे पढ़ने को मिलीं, बहुत खुशी भी हुई सोचा कि
चलो अब अपनी ही भाषा में साक्षात्कार दूंगी। साक्षात्कार कक्ष में घुसी तो सबसे
पहले मुझे अंग्रेजी में यह हिदायत दी गई कि आप हिन्दी का एक शब्द भी इस्तेमाल नहीं
कर सकतीं। बहुत बड़ा धक्का लगा मुझे। भारत में अंग्रेजी शासन तो अपनी आंखों से
नहीं देखा था मैंने पर उस दिन पता चल गया कि क्या होता होगा हिन्दी बोलने वाले
भारतीयों के साथ। बेमन से साक्षात्कार दिया और बाहर चली आयी मन किया कि वहां
हिन्दी की प्रशंसा में लगी सारी तख्तियां उखाड़ कर फेंक दूं पर ऐसा करना मेरे बस
में नहीं था फिर जैसी उम्मीद थी मेरा वहां चयन भी नहीं हुआ। सरकारी दफ़्तर ही
क्यों हमारे कितने सांसद संसद की कार्यवाही के दौरान हिन्दी में प्रश्नोत्तर करते
नज़र आते हैं? मुश्किल से चंद सांसद ही हिन्दी का उपयोग संसद
में करते हैं। बाकी जिन्हें हिन्दी आती है वो भी नहीं करते और जिन्हें नहीं आती
उनकी तो मजबूरी है।
यह तो बस एक छोटा सा किस्सा था ऐसे न जाने कितने
दंश हिन्दी को रोज झेलने पड़ते हैं और ये तब तक जारी रहेगा जब तक हिन्दी रोज़गार
की ज़रूरत नहीं बन जाती। बचपन में पढ़ा था आवश्यकता अविष्कार की जननी है अब लगता
है आवश्यकता सिर्फ अविष्कार नहीं भाषाओं की भी जननी है। हिन्दी का विकास सिर्फ
तख्तियां लगाने, हिन्दी दिवस और हिन्दी पखवाड़ा मनाने से संभव नहीं हैं। हिन्दी या
किसी भी दूसरी भाषा का विकास सिर्फ उसकी उपयोगिता पर निर्भर है। हिन्दी फिल्में
लोकप्रिय क्यों हैं, टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले ज़्यादातर विज्ञापन हिन्दी में
क्यों होते हैं क्योंकि वो बाज़ार की ज़रूरत हैं और उनसे निर्माता और निर्देशक
मुनाफ़ा कमाते हैं। हिन्दी में फ़िल्में और विज्ञापन बनाना किसी का हिन्दी प्रेम नहीं
है बल्कि ये उनका रोज़गार है जिससे उनकी कमाई होती है। अगर मुनाफ़ा बंद हो जाए तो
हिन्दी की जगह कोई और भाषा ले लेगी। इसलिए ज़रूरी है कि हिन्दी का रोज़गार की भाषा
के रूप में विकास हो। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में
भी पढ़ने और पढ़ाने की व्यवस्था हो। साथ ही ज्ञान और भाषा को एक ही तराजु में
तौलनें की प्रक्रिया बंद हो क्योंकि किसी एक ख़ास भाषा का ज्ञान होना एक अलग बात
है और ज्ञानी होना अलग।
आज जनसत्ता में आपका यह आलेख पढ़कर अच्छा लग…
ReplyDeleteबधाई ..
हिंदी दशा पर सार्थक प्रस्तुति ...करनी और कथनी में कितना फर्क है यह हिंदी लिखने-पढने वाले समझकर भी बहुत कुछ नहीं कर पाते जो दुखद है ...
सही है
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